ये ‘रिश्वत’ नहीं… हमारी पहचान है

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दस्तक

रिश्वत की बात हमारे मुल्क की वो हकीकत है जिसके जरिये हमें हर तरह की रियायत मिलने की गारंटी है.
तो क्या ‘रिश्वत’ वो हथियार है जिसका लोहा पुलिस भी मानती है… और इस्तेमाल भी करती है?
या फिर – ‘रिश्वत’ हमारी पहचान है – कम से कम इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट से तो यही संकेत मिलते हैं.

बैठक

कहते हैं अगर सही मकसद के लिए झूठ बोला जाए तो उसे सच की श्रेणी में रखते हैं. तो क्या सही मकसद के लिए रिश्वत भी भ्रष्टाचार की कैटेगरी से दूर रखा जा सकता है. शायद हां, शायद नहीं – वैसे बहस का मुद्दा यहां यह नहीं है.

दिल्ली के बटला हाउस एनकाउंटर को लेकर इंडियन एक्सप्रेस में एक स्टोरी है. एटीएस टीम ने किस तरह शहजाद की घेरेबंदी की और कैसे उसे दबोचा? इसका किस्सा काफी दिलचस्प है. शहजाद को इस केस में कोर्ट ने दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल के अफसर एमसी शर्मा की हत्या का दोषी पाया है.

इंडियन एक्स्प्रेस की खबर के मुताबिक उत्तर प्रदेश की एटीएस टीम को शहजाद के आजमगढ़ के एक गांव में छिपे होने की भनक लगी. एटीएस को साफ हिदायत थी कि वह उस जगह तभी रेड डाले जब ये बात पक्की हो कि शहजाद वहां है. तब तक यह मामला सियासी रंग अख्तियार कर चुका था. हालांकि, अब कोर्ट में साबित हो चुका है कि यह मुठभेड़ फर्जी नहीं थी.
बताते हैं कि एटीएस टीम के सदस्य पहले पोलियो ड्रॉप पिलाने के बहाने, फिर राजस्व विभाग के कर्मचारी बन कर इलाके में चुपके से छानबीन करने की कोशिश किये – मगर बात नहीं बनी.
इसके बाद एटीएस टीम के लोग सरकारी मेकैनिक बन कर पहुंचे. इस बार उन्होंने वहां एक हैंड पंप लगाने का प्रस्ताव रखा. यह हैंड पंप शहजाद के घर पर लगना तय हुआ.
अब चुनौती थी खुद को सरकारी मेकैनिक साबित करने की. उन्हें घरवालों को यकीन दिलाना था कि वाकई वे सरकारी मुलाजिम हैं. वैसे वे सरकारी मुलाजिम तो थे ही – अपने मकसद में कामयाबी के लिए काम और हुलिया बदल लिया था.
मेकैनिक बने पुलिसवालों ने घरवालों को बताया कि हैंड पंप तो लग जाएगा, लेकिन उसके लिए कुछ रिश्वत देनी पड़ेगी. उन्होंने बताया कि उनका हेड रकम लेने आएगा.
अगले दिन जब रिश्वत की रकम लेने एटीएस अफसर पहुंचा तो इसके लिए शहजाद खुद आया. अब तक सब कुछ पुलिस के मनमुताबिक होता गया – और पुलिस ने बगैर वक्त गंवाए शिकार को दबोच लिया.
इस खबर में रिश्वत की रकम कितनी थी? कहां गई? इन बातों का कोई जिक्र नहीं है.

रुख़सत

रिपोर्ट में इस बात का जिक्र तो नहीं है – मगर ऐसा लगता है कि उन्हें ऐसी पुख्ता पहचान पेश करने की जरूर सूझी होगी जिस पर शातिर से शातिर दिमाग वाले के लिए भी शक का स्कोप न हो. शायद इसीलिए उन्होंने ब्रह्मास्त्र का सहारा लिया. तभी तो उन्होंने ‘आई कार्ड’ की जगह ‘रिश्वत’ की डिमांड कर असली सरकारी कर्मचारी साबित किया.
रिश्वत वाकई सबसे पुख्ता परिचय पत्र है – किसी भी सरकारी मुलाजिम के लिए – ये बात अलग है कि यहां मकसद कानून की हिफाजत था.

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